Saturday, March 20, 2010

कविता (माँ)

माँ तुझ पैर क्या लिखू शब्द नहीं मिलते
तेरे कदमो में है जन्नत
तेरे चेरे से है नूर इस जग का
तेरे हाथो की छुआन मुझे रब का एहसास कराती है
माँ तेरी बहुत याद आती है ।

माँ तेरी पपई याद आती
रात की वो थप्पी याद आती है
सर्दियों की धुप में मेरे चहेरे को छुपाती
तेरी वो साडी याद आती है
गर्मियों की दोपहर में पंखा झालती
मुझको तेरे हाथो की याद आती है
माँ तेरी बहुत याद आती है
वो खिचड़ी वो भात वो बाटी वो दाल
वो तेरा बिठाकर हाथ से खिलाना
अब तो रोटी खाई क्या निगली भी नहीं जाती है
माँ तेरी बहुत याद आती है
धन्यवाद